Friday, November 11, 2005

बस यूं ही......

आज बस यूं ही बैठे-बैठे सोंचा क्यों न अपना एक ब्लाग बनाया जाय। अब चूंकि हम कोई लेखक नहीं हैं, बस यूं ही अपनी बात कहने का एक मंच होगा ये ब्लाग; तो नाम भी "बस यूं ही" रख दिया।
हिन्दी ब्लाग जगत में पाठक के रूप में तो हम बहुत दिनों से जुड़े हुये हैं। हमारे पसन्दीदा चिट्ठाकार हैं- सुनील दीपक और अनूप शुक्ला
सुनील जी का लेखन का तरीका हमें बहुत ही पसन्द है। वे किसी भी बात को सुन्दर और बड़े ही परिपक्व ढंग से प्रस्तुत कर सकते हैं। और उनके चिट्ठे में चित्रों का समावेश भी बहुत ही सुन्दर होता है।
अनूप जी का लेखन का ढंग गम्भीर न होकर हास्य का पुट लिये होता है। उनके लेखन में बहुत गहराई होती है; जिसे शायद सभी लोग नहीं समझ पाते होंगे। उनका लेखन गहरे सागर की तरह है; और हमारे ख्याल से ज्यादातर पाठक उथले पानी में हंसते हुये गुज़र जाते होंगे। गहराई में तो कुछ लोग ही जा पाते होंगे, और शायद समझ पाते होंगे कि उन्होंने क्या कहने की कोशिश की है। एक बार उनके ही ब्लाग पर किसी ने टिप्पड़ी की थी कि "आपके व्यंग्य की चोट बहुत गहरी होती है" और ये बात शत-प्रतिशत सही है। अनूप जी के चिट्ठे में उनके पसन्दीदा कवियों की कवितायें हमें बहुत पसन्द आती हैं।
तो अब जब हमने चिट्ठा लिखना शुरु कर ही दिया है तो अपने पसन्दीदा चिट्ठाकारों से प्रेरणा (नकल के लिये क्षमा याचना सहित) लेकर उसी तर्ज पर हम भी लिखने का प्रयास करेंगे।हमारे हर चिट्ठे में भी हर बार आप देखेंगे एक तस्वीर और एक कविता।
तो आज की तस्वीर प्रकृति के खूबसूरत रंगो की। आजकल चारों तरफ पतझड़ छाया हुआ है, और पेड़ों के पत्ते जादुई रंगो में तब्दील हो गये हैं.....



और आज की मेरी पसंद की नज़्म है परवीन शाकिर की:-
शिकन चुप है
बदन खामोश है
गालों पे वैसी तमतमाहट भी नहीं,
लेकिन मैं घर से कैसे निकलूंगी
हवा,चंचल सहेली की तरह बाहर खड़ी है
देखते ही मुस्कुराएगी!
मुझे छूकर तेरी हर बात पा लेगी
तुझे मुझसे चुरा लेगी
जमाने भर से कह देगी,
मैं तुझसे मिल के आई हूं!
हवा की शोखियां ये
और मेरा बचपना ऎसा
किं अपने आप से भी मैं
तिरी खुशबू छुपाती फिर रही हूं!
--परवीन शाकिर